Monday, 7 October 2024

देवी चन्द्रघण्टा

 


देवी चन्द्रघण्टा


उत्पत्ति

देवी पार्वती के विवाहित स्वरूप को देवी चन्द्रघण्टा के रूप में जाना जाता है। भगवान शिव से विवाह होने के पश्चात् देवी महागौरी ने अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करना आरम्भ कर दिया, जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चन्द्रघण्टा के नाम से जाना जाने लगा।

नवरात्रि पूजा

नवरात्रि उत्सव के तृतीय दिवस के अवसर पर देवी चन्द्रघण्टा की पूजा-उपासना की जाती है।

शासनाधीन ग्रह

मान्यताओं के अनुसार, देवी चन्द्रघण्टा शुक्र ग्रह को शासित करती हैं।

स्वरूप वर्णन

देवी चन्द्रघण्टा बाघिन की सवारी करती हैं। वह अपने मस्तक पर अर्धवृत्ताकार चन्द्रमा धारण करती हैं। उनके मस्तक पर अर्धचन्द्र घण्टे के समान प्रतीत होता है तथा इसी कारण से देवी माता को चन्द्रघण्टा के नाम से जाना जाता है। देवी चन्द्रघण्टा को दस भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। देवी चन्द्रघण्टा अपने चार बायें हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार तथा कमण्डलु धारण करती हैं तथा पाँचवाँ बायाँ हाथ वर मुद्रा में रखती हैं। वह अपने चार दाहिने हाथों में कमल पुष्प, तीर, धनुष तथा जप माला धारण करती हैं तथा पाँचवें दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती हैं।

विवरण

देवी पार्वती का यह रूप शान्तिपूर्ण एवं अपने भक्तों का कल्याण करने वाला है। इस रूप में देवी चन्द्रघण्टा अपने सभी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित युद्ध हेतु तत्पर रहती हैं। मान्यतानुसार, उनके मस्तक पर विद्यमान चन्द्र-घण्टी की ध्वनि उनके भक्तों की समस्त प्रकार की शक्तियों से रक्षा करती हैं।

प्रिय पुष्प

चमेली

मन्त्र

ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः॥

प्रार्थना

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु माँ चन्द्रघण्टा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चन्द्रघण्टा यशस्विनीम्॥
मणिपुर स्थिताम् तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खङ्ग, गदा, त्रिशूल, चापशर, पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वन्दना बिबाधारा कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टम् मन्त्र स्वरूपिणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायिनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्॥

कवच

रहस्यम् शृणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघण्टास्य कवचम् सर्वसिद्धिदायकम्॥
बिना न्यासम् बिना विनियोगम् बिना शापोध्दा बिना होमम्।
स्नानम् शौचादि नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिदाम॥
कुशिष्याम् कुटिलाय वञ्चकाय निन्दकाय च।
न दातव्यम् न दातव्यम् न दातव्यम् कदाचितम्॥

आरती

जय माँ चन्द्रघण्टा सुख धाम। पूर्ण कीजो मेरे काम॥
चन्द्र समाज तू शीतल दाती। चन्द्र तेज किरणों में समाती॥
मन की मालक मन भाती हो। चन्द्रघण्टा तुम वर दाती हो॥
सुन्दर भाव को लाने वाली। हर संकट में बचाने वाली॥
हर बुधवार को तुझे ध्याये। सन्मुख घी की ज्योत जलाये॥
श्रद्दा सहित तो विनय सुनाये। मूर्ति चन्द्र आकार बनाये॥
शीश झुका कहे मन की बाता। पूर्ण आस करो जगत दाता॥
काँचीपुर स्थान तुम्हारा। कर्नाटिका में मान तुम्हारा॥
नाम तेरा रटूँ महारानी। भक्त की रक्षा करो भवानी॥

Sunday, 6 October 2024

देवी महागौरी

 



उत्पत्ति

हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी शैलपुत्री सोलह वर्ष की आयु में अत्यन्त रूपवती थीं तथा उनका वर्ण अत्यधिक श्वेत एवं धवल था। उनके अत्यधिक गौर वर्ण के कारण उन्हें देवी महागौरी के नाम से जाना जाने लगा।

नवरात्रि पूजा

नवरात्रि उत्सव के अष्टम दिवस के अवसर पर देवी महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है।

शासनाधीन ग्रह

मान्यताओं के अनुसार, राहु ग्रह को देवी महागौरी शासित करती हैं।

स्वरूप वर्णन

देवी महागौरी एवं देवी शैलपुत्री दोनों का वाहन बैल है तथा इसी कारण से उन्हें वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। देवी महागौरी को चतुर्भुज रूप में दर्शाया गया है। वह अपने एक दाहिने हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं तथा दूसरे दाहिने हाथ को अभय मुद्रा में रखती हैं। वह एक बायें हाथ में डमरू धारण करती हैं तथा दूसरे बायें हाथ को वर मुद्रा में रखती हैं।

विवरण

अपने नाम के ही अनुसार, देवी महागौरी अत्यन्त गौर वर्ण वाली हैं। देवी महागौरी के गौर वर्ण के कारण उनकी तुलना शंख, चन्द्रमा तथा कुन्द के श्वेत पुष्प द्वारा की जाती है। वह मात्र श्वेत वस्त्र धारण करती हैं तथा इसी कारण उन्हें श्वेताम्बरधरा के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है।

प्रिय पुष्प

रात की रानी

मन्त्र

ॐ देवी महागौर्यै नमः॥

प्रार्थना

श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥

स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान

वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहारूढा चतुर्भुजा महागौरी यशस्विनीम्॥
पूर्णन्दु निभाम् गौरी सोमचक्रस्थिताम् अष्टमम् महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीयां लावण्यां मृणालां चन्दन गन्धलिप्ताम्॥

स्तोत्र

सर्वसङ्कट हन्त्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदायनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यमङ्गल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददम् चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

ॐकारः पातु शीर्षो माँ, हीं बीजम् माँ, हृदयो।
क्लीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाटम् कर्णो हुं बीजम् पातु महागौरी माँ नेत्रम् घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा माँ सर्ववदनो॥

आरती

जय महागौरी जगत की माया। जय उमा भवानी जय महामाया॥
हरिद्वार कनखल के पासा। महागौरी तेरा वहा निवासा॥
चन्द्रकली और ममता अम्बे। जय शक्ति जय जय माँ जगदम्बे॥
भीमा देवी विमला माता। कौशिक देवी जग विख्यता॥
हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा। महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥
सती (सत) हवन कुण्ड में था जलाया। उसी धुयें ने रूप काली बनाया॥
बना धर्म सिंह जो सवारी में आया। तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥
तभी माँ ने महागौरी नाम पाया। शरण आने वाले का संकट मिटाया॥
शनिवार को तेरी पूजा जो करता। माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥
भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो। महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

 देवी शैलपुत्री                                        देवी चन्द्रघण्टा  

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Saturday, 5 October 2024

12 महीने बाद शुक्र ग्रह करेंगे गुरु के घर में प्रवेश, इन 3 राशि वालों को मिलेगा अपार पैसा और पद- प्रतिष्ठा!

Shukra Planet Transit In Dhanu: वैदिक ज्योतिष अनुसार शुक्र ग्रह धनु राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। जिससे कुछ राशियों की किस्मत चमक सकती है...

Written by - Saurabh Garg Ji 

धन के दाता शुक्र ग्रह करेंगे धनु राशि में प्रवेश-

Venus Transit In Dhanu:  वैदिक ज्योतिष अनुसार इस साल दिवाली का पर्व 31 अक्टूबर को मनाया जाएगा। वहीं आपको बता दें कि दिवाली बाद धन और वैभव के दाता शुक्र ग्रह की चाल में बदलाव होने जा रहा है। आपको बता दें कि शुक्र ग्रह धनु राशि में प्रवेश करने जा रहे हैं। जिससे कुछ राशियों का भाग्य चमक सकता है। साथ ही इन लोगों को धन, पद और वैभव की प्राप्ति हो सकती है। आइए जानते हैं ये लकी राशियां कौन सी हैं…

कन्या राशि (Kanya Zodiac)

आप लोगों के लिए शुक्र ग्रह का गोचर लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। क्योंकि शुक्र ग्रह आपकी राशि से चतुर्थ भाव पर संचऱण करने जा रहे हैं। इसलिए इस दौरान आपको भौतिक सुखों की प्राप्ति हो सकती है। साथ ही इस समय आपको वाहन और प्रापर्टी का सुख प्राप्त हो सकता है। वहीं इस समय नौकरीपेशा लोगों के लिए लाभ के योग हैं। बेरोजगार लोगों को अच्छी नौकरी मिल सकती है और लोगों के करियर के लिए समय बहुत अनुकूल है। साथ ही इस दौरान आपके माता के साथ संबंधों में मधुरता आएगी। वहीं माता के माध्यम से धनलाभ हो सकता है।

कुंभ राशि (Kumbh Zodiac)

शुक्र ग्रह का राशि परिवर्तन कुंभ राशि के जातकों को अनुकूल साबित हो सकता है। क्योंकि शुक्र देव आपकी गोचर कुंडली के इनकम और लाभ स्थान पर संचरण करने जा रहे हैं। इसलिए इस दौरान आपकी आय में जबरदस्त इजाफा हो सकता है। साथ ही आपकी प्रफेशनल लाइफ में बड़े ही सकारात्‍मक बदलाव आएंगे और जो लोग विदेश से बिजनस करते हैं उनके लिए यह गोचर कमाई करने वाला साबित होगा। वहीं इस समय आपको निवेश से लाभ के योग बनेंगे। साथ ही जो लोग एक्सपोर्ट और इंपोर्ट से संबंधित बिजनेस करते हैं, उनके लिए समय लाभप्रद रहेगा।

मिथुन राशि (Mithun Zodiac)

आप लोगों के लिए शुक्र ग्रह का गोचर लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। क्योंकि शुक्र ग्रह आपकी राशि से सप्तम भाव पर संचऱण करने जा रहे हैं। इसलिए इस दौरान आपका वैवाहिक जीवन शानदार रहेगा। वहीं जीवनसाथी की तरक्की हो सकती है। साथ ही इस समय अविवाहित लोगों को विवाह का प्रस्ताव आ सकता है। वहीं इस दौरान आपको पार्टनरशिप के व्यापार में लाभ हो सकता है। साथ ही बेरोजगार लोगों को अच्छी नौकरी मिल सकती है और लोगों के करियर के लिए समय बहुत अनुकूल है। साथ ही इस दौरान आपको मान- सम्मान और प्रतिष्ठा की प्राप्ति हो सकती है। 


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देवी शैलपुत्री

उत्पत्ति

देवी सती के रूप में आत्मदाह करने के उपरान्त, देवी पार्वती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। संस्कृत में शैल का अर्थ पर्वत होता है, जिसके कारण देवी को पर्वत की पुत्री, अर्थात शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है।

नवरात्रि पूजा

नवरात्रि उत्सव के प्रथम दिवस पर देवी शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है।

शासनाधीन ग्रह

मान्यताओं के अनुसार, सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करने वाले चन्द्रमा, देवी शैलपुत्री द्वारा शासित हैं। आदि शक्ति के इस शैलपुत्री रूप की पूजा करने से चन्द्र ग्रह से सम्बन्धित समस्त नकारात्मक प्रभावों से रक्षा की जा सकती है।

स्वरूप वर्णन

देवी शैलपुत्री का वाहन बैल है एवं अतः उन्हें वृषारूढ़ा के नाम से भी जाना जाता है। देवी शैलपुत्री को दो भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल एवं बायें हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है।

विवरण

देवी शैलपुत्री को देवी हेमवती एवं देवी पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। सभी नौ रूपों में अपने विशेष महत्व के कारण ही नवरात्रि के प्रथम दिवस पर देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है। अपने पूर्व जन्म में देवी सती के रूप के समान ही, देवी शैलपुत्री का विवाह भी भगवान शिव के साथ हुआ था।

प्रिय पुष्प

चमेली

मन्त्र

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥

प्रार्थना

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
पूणेन्दु निभाम् गौरी मूलाधार स्थिताम् प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

स्तोत्र

प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागरः तारणीम्।
धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानन्द प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह विनाशिनीं।
मुक्ति भुक्ति दायिनीं शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥

कवच

ॐकारः में शिरः पातु मूलाधार निवासिनी।
हींकारः पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥
श्रींकार पातु वदने लावण्या महेश्वरी।
हुंकार पातु हृदयम् तारिणी शक्ति स्वघृत।
फट्कार पातु सर्वाङ्गे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

आरती

शैलपुत्री माँ बैल असवार। करें देवता जय जय कार॥
शिव-शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने न जानी॥
पार्वती तू उमा कहलावें। जो तुझे सुमिरे सो सुख पावें॥
रिद्धि सिद्धि प्रदान करे तू। दया करें धनवान करें तू॥
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती जिसने तेरी उतारी॥
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुःख तकलीफ मिटा दो॥
घी का सुन्दर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के॥
श्रद्धा भाव से मन्त्र जपायें। प्रेम सहित फिर शीश झुकायें॥
जय गिरराज किशोरी अम्बे। शिव मुख चन्द्र चकोरी अम्बे॥
मनोकामना पूर्ण कर दो। चमन सदा सुख सम्पत्ति भर दो॥

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Friday, 4 October 2024

देवी ब्रह्मचारिणी

                    देवी ब्रह्मचारिणी

उत्पत्ति
कूष्माण्डा स्वरूप धारण करने के उपरान्त देवी पार्वती ने दक्ष प्रजापति के घर जन्म लिया। देवी पार्वती अपने इस अवतार में एक महान सती थीं तथा उनके अविवाहित रूप को देवी ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा जाता है।

नवरात्रि पूजा
नवरात्रि उत्सव के द्वितीय दिवस पर देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा-उपासना की जाती है।

शासनाधीन ग्रह
मान्यताओं के अनुसार, समस्त सौभाग्य के दाता मंगल भगवान को देवी ब्रह्मचारिणी द्वारा शासित किया जाता है।

स्वरूप वर्णन
देवी ब्रह्मचारिणी को पादुकाहीन चरणों से चलते हुये दर्शाया गया है। उनकी दो भुजायें हैं। वह दाहिने हाथ में जप माला एवं बायें हाथ में कमण्डलु धारण करती हैं।

विवरण
देवी ब्रह्मचारिणी ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने हेतु कठोर तपस्या की थी। उनकी कठोर तपस्या के कारण, उन्हें ब्रह्मचारिणी के नाम से सम्बोधित किया गया है।

विद्वानों के अनुसार, भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त करने हेतु अपने तप काल में, देवी ब्रह्मचारिणी ने भूमि शयन करते हुये 1000 वर्ष तक पुष्पों एवं फलों के आहार पर तथा आगामी 100 वर्ष तक पत्तेदार शाक-सब्जियों के आहार पर व्यतीत किये थे।

इसके अतिरिक्त, भीषण ग्रीष्म ऋतु, कठोर शीत ऋतु तथा चक्रवाती घनघोर वर्षा में खुले आकाश में निर्जन स्थान पर देवी ने कठिन उपवास का पालन किया। हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शंकर से प्रार्थना करते हुये देवी माँ ने 3000 वर्षों तक मात्र बिल्व पत्र के आहार पर ही निर्वहन किया था। कुछ समय पश्चात् उन्होंने बिल्व पत्र ग्रहण करना भी बन्द कर दिया तथा बिना अन्न-जल के निरन्तर तपस्या की थी। बिल्व पत्र का सेवन भी त्याग देने के कारण, देवी पार्वती अपर्णा के नाम से सम्पूर्ण जगत में विख्यात हुयीं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी ब्रह्मचारिणी ने इसीलिये आत्मदाह कर लिया था ताकि, वह अपने अगले जन्म में उन्हें ऐसे पिता प्राप्त हों, जो उनके पति भगवान शिव का सम्मान कर सकें।

प्रिय पुष्प
चमेली

मन्त्र
ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

प्रार्थना
दधाना कर पद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥

स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
जपमाला कमण्डलु धरा ब्रह्मचारिणी शुभाम्॥
गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालङ्कार भूषिताम्॥
परम वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र
तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।
ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥
शङ्करप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

कवच
त्रिपुरा में हृदयम् पातु ललाटे पातु शङ्करभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥
पञ्चदशी कण्ठे पातु मध्यदेशे पातु महेश्वरी॥
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।
अङ्ग प्रत्यङ्ग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

आरती
जय अम्बे ब्रह्मचारिणी माता। जय चतुरानन प्रिय सुख दाता॥
ब्रह्मा जी के मन भाती हो। ज्ञान सभी को सिखलाती हो॥
ब्रह्म मन्त्र है जाप तुम्हारा। जिसको जपे सरल संसारा॥
जय गायत्री वेद की माता। जो जन जिस दिन तुम्हें ध्याता॥
कमी कोई रहने ना पाये। कोई भी दुःख सहने न पाये॥
उसकी विरति रहे ठिकाने। जो तेरी महिमा को जाने॥
रद्रक्षा की माला ले कर। जपे जो मन्त्र श्रद्धा दे कर॥
आलस छोड़ करे गुणगाना। माँ तुम उसको सुख पहुँचाना॥
ब्रह्मचारिणी तेरो नाम। पूर्ण करो सब मेरे काम॥
भक्त तेरे चरणों का पुजारी। रखना लाज मेरी महतारी॥

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Wednesday, 2 October 2024

2024 शारदीय नवरात्रि | आश्विन नवरात्रि


2024 शारदीय नवरात्रि | आश्विन नवरात्रि

नवरात्रि, देवी दुर्गा को समर्पित नौ दिवसीय त्यौहार है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, नौ रातें। इन नौ रात्रियों एवं दस दिनों की अवधि में देवी दुर्गा के 9 भिन्न-भिन्न रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। इस उत्सव के दसवें दिन को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है तथा इस दिन देवी दुर्गा की मूर्तियों को पवित्र जल स्रोतों में विसर्जित किया जाता है।

नवरात्रि भारत के अधिकांश राज्यों में हर्षोल्लास से मनायी जाती है। हालाँकि, नवरात्रि पश्चिमी राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिणी राज्य कर्णाटक में अत्यन्त लोकप्रिय त्यौहार है। नवरात्रि के प्रथम दिवस पर, मन्त्रजाप सहित पूर्ण वैदिक अनुष्ठानों का पालन करते हुये कलश में देवी दुर्गा का आह्वान किया जाता है। देवी दुर्गा का आह्वान एवं कलश में वास करने की क्रिया को घटस्थापना अथवा कलशस्थापना के रूप में जाना जाता है। घटस्थापना अनुष्ठान दिन में उपयुक्त समय पर किया जाता है।

पश्चिम बंगाल में नवरात्रि को दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। पश्चिम बंगाल में, नवरात्रि के अन्तिम तीन दिनों में देवी दुर्गा की पूजा की जाती है और इन तीन दिनों को दुर्गा सप्तमी, दुर्गा अष्टमी तथा दुर्गा नवमी के नाम से जाना जाता है। यह कहना सही होगा कि पश्चिम बंगाल में की जाने वाली दुर्गा पूजा नौ दिवसीय नवरात्रि का एक लघु संस्करण है। दुर्गा पूजा के समय नवरात्रि के छठवें दिन कल्पारम्भ एवं बिल्व निमन्त्रण अनुष्ठान किया जाता है, जो प्रतीकात्मक रूप से अन्य राज्यों में की जाने वाली घटस्थापना या कलशस्थापना के ही समान है।

हिन्दु धर्म ग्रन्थों में नौ दिवसीय नवरात्रि के विकल्प के रूप में 7 दिवसीय नवरात्रि, 5 दिवसीय नवरात्रि, 3 दिवसीय नवरात्रि, 2 दिवसीय नवरात्रि और यहाँ तक कि 1 दिवसीय नवरात्रि का भी वर्णन प्राप्त होता है।

ज्योति कलश, कुमारी पूजा, सन्धि पूजा, नवमी होम, ललिता व्रत एवं चण्डी पाठ इत्यादि अन्य वे प्रसिद्ध अनुष्ठान एवं कार्यक्रम हैं, जो 9 दिवसीय नवरात्रि उत्सव के दौरान किये जाते हैं।

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देवी कूष्माण्डा


उत्पत्ति
देवी सिद्धिदात्री का रूप धारण करने के पश्चात्, ब्रह्माण्ड को ऊर्जा प्रदान करने हेतु देवी पार्वती सूर्य मण्डल के मध्य निवास करने लगीं। इसके पश्चात् से ही देवी को कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। कूष्माण्डा वह देवी हैं, जिनमें सूर्य के अन्दर निवास करने की शक्ति एवं क्षमता है। देवी माता की देह की कान्ति एवं तेज सूर्य के समान दैदीप्यमान है।

नवरात्रि पूजा
नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर देवी कूष्माण्डा की पूजा-अर्चना की जाती है।

शासनाधीन ग्रह
मान्यताओं के अनुसार, देवी कूष्माण्डा सूर्य ग्रह को दिशा एवं ऊर्जा प्रदान करती हैं। अतः भगवान सूर्य देवी कूष्माण्डा द्वारा शासित होते हैं।

स्वरूप वर्णन
देवी सिद्धिदात्री सिंही पर सवार हैं। देवी को अष्टभुजाधारी रूप में दर्शाया गया है। उनके दाहिने हाथों में कमण्डलु, धनुष, बाण एवं कमल तथा बायें हाथों में क्रमशः अमृत कलश, जप माला, गदा एवं चक्र सुशोभित हैं।

विवरण
देवी कूष्माण्डा की आठ भुजायें हैं, अतः उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। भक्तों की मान्यता है कि, सिद्धियाँ तथा निधियाँ प्रदान करने की समस्त शक्ति देवी माँ की जप माला में विद्यमान है।

यह वर्णित है कि, देवी माता ने अपनी मधुर मुस्कान से सम्पूर्ण संसार की रचना की, जिसे संस्कृत में ब्रह्माण्ड कहा जाता है। देवी माँ को श्वेत कद्दू की बली अति प्रिय है, जिसे कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। ब्रह्माण्ड तथा कूष्माण्ड से सम्बन्धित होने के कारण, देवी का यह रूप देवी कूष्माण्डा के नाम से लोकप्रिय हैं।

प्रिय पुष्प
लाल रँग के पुष्प

मन्त्र
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः॥

प्रार्थना
सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥

स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान
वन्दे वाञ्छित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्विनीम्॥
भास्वर भानु निभाम् अनाहत स्थिताम् चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पद्म, सुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥
पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि, रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कान्त कपोलाम् तुगम् कुचाम्।
कोमलाङ्गी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

Stotra
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहि दुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

Kavacha
हंसरै में शिर पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।
हसलकरीं नेत्रेच, हसरौश्च ललाटकम्॥
कौमारी पातु सर्वगात्रे, वाराही उत्तरे तथा,
पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।
दिग्विदिक्षु सर्वत्रेव कूं बीजम् सर्वदावतु॥

Aarti
कूष्माण्डा जय जग सुखदानी। मुझ पर दया करो महारानी॥
पिङ्गला ज्वालामुखी निराली। शाकम्बरी माँ भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे। भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा। स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदम्बे। सुख पहुँचाती हो माँ अम्बे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा। पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
माँ के मन में ममता भारी। क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा। दूर करो माँ संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो। मेरे तुम भण्डारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याये। भक्त तेरे दर शीश झुकाये॥

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देवी सिद्धिदात्री


Goddess Siddhidatri

देवी सिद्धिदात्री


उत्पत्ति
सृष्टि के आरम्भ में भगवान रुद्र ने सृजन के उद्देश्य से आदि-पराशक्ति की आराधना की थी। मान्यताओं के अनुसार, देवी आदि-पराशक्ति का कोई निश्चित रूप अथवा आकर नहीं था। आदि-पराशक्ति, जो शक्ति की सर्वोच्च देवी हैं, भगवान शिव के वाम अङ्ग से सिद्धिदात्री के रूप में प्रकट हुयी हैं।

नवरात्रि पूजा
नवरात्रि के नौवें दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा-आराधना की जाती है।

शासनाधीन ग्रह
मान्यताओं के अनुसार, देवी सिद्धिदात्री केतु ग्रह को दिशा एवं ऊर्जा प्रदान करती हैं। अतः केतु ग्रह देवी सिद्धिदात्री द्वारा शासित होता है।

स्वरूप वर्णन
देवी सिद्धिदात्री कमल पुष्प पर विराजमान हैं तथा वह सिंह की सवारी करती हैं। देवी माँ को चतुर्भुज रूप में दर्शाया गया है। उनके एक दाहिने हाथ में गदा, दूसरे दाहिने हाथ में चक्र, एक बायें हाथ में कमल पुष्प तथा दूसरे बायें हाथ में शंख सुशोभित है।

विवरण
माता सिद्धिदात्री अपने भक्तों को समस्त प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। भगवान शिव को भी देवी सिद्धिदात्री की कृपा से ही सभी सिद्धियाँ प्राप्त हुयी थीं। उनकी पूजा मात्र मनुष्य ही नहीं अपितु देव, गन्धर्व, असुर, यक्ष एवं सिद्ध भी करते हैं। भगवान भोलेनाथ के वाम अँग से देवी सिद्धिदात्री के प्रकट होने के पश्चात् ही भगवान शिव को अर्ध-नारीश्वर की उपाधि प्राप्त हुयी थी।

प्रिय पुष्प
रात की रानी

मन्त्र
ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः॥

प्रार्थना
सिद्ध गन्धर्व यक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥

स्तुति
या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

ध्यान
वन्दे वाञ्छित मनोरथार्थ चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
कमलस्थिताम् चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्विनीम्॥
स्वर्णवर्णा निर्वाणचक्र स्थिताम् नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शङ्ख, चक्र, गदा, पद्मधरां सिद्धीदात्री भजेम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालङ्कार भूषिताम्।
मञ्जीर, हार, केयूर, किङ्किणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वन्दना पल्लवाधरां कान्त कपोला पीन पयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटिं निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र
कञ्चनाभा शङ्खचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥
पटाम्बर परिधानां नानालङ्कार भूषिताम्।
नलिस्थिताम् नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोऽस्तुते॥
परमानन्दमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥
विश्वकर्ती, विश्वभर्ती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता, विश्वातीता सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भवसागर तारिणी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥
धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनीं।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिद्धिदात्री नमोऽस्तुते॥

कवच
ॐकारः पातु शीर्षो माँ, ऐं बीजम् माँ हृदयो।
हीं बीजम् सदापातु नभो गृहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजम् पातु क्लीं बीजम् माँ नेत्रम् घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै माँ सर्ववदनो॥

आरती
जय सिद्धिदात्री माँ तू सिद्धि की दाता। तु भक्तों की रक्षक तू दासों की माता॥
तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि। तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि॥
कठिन काम सिद्ध करती हो तुम। जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम॥
तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है। तू जगदम्बें दाती तू सर्व सिद्धि है॥
रविवार को तेरा सुमिरन करे जो। तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो॥
तू सब काज उसके करती है पूरे। कभी काम उसके रहे ना अधूरे॥
तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया। रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया॥
सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली। जो है तेरे दर का ही अम्बें सवाली॥
हिमाचल है पर्वत जहाँ वास तेरा। महा नन्दा मन्दिर में है वास तेरा॥
मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता। भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता॥

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नवरात्रि नवदुर्गा

नवदुर्गा का अर्थ है, नौ दुर्गा। नवदुर्गा, माँ दुर्गा की नौ विभिन्न रूपों में अभिव्यक्ति है। नवदुर्गा की अवधारणा देवी पार्वती से उत्पन्न होती है। वैचारिक रूप से नवदुर्गा देवी पार्वती का जीवन चरण है, जिन्हें सभी देवी-देवताओं में सर्वोच्च शक्ति माना जाता है। वर्ष में सभी चार नवरात्रि के दौरान नवदुर्गा की पूजा की जाती है।

नौ देवियाँ
माँ दुर्गा के नौ रूप इस प्रकार हैं -

                          देवी सिद्धिदात्री

                          देवी कूष्माण्डा

                         देवी ब्रह्मचारिणी
                          देवी शैलपुत्री

1. देवी सिद्धिदात्री - ब्रह्माण्ड के आरम्भ में भगवान रुद्र ने सृजन हेतु आदि-पराशक्ति की पूजा की। मान्यताओं के अनुसार, देवी आदि-पराशक्ति का कोई रूप नहीं था अर्थात वह निराकार रूप में थीं। शक्ति की सर्वोच्च देवी, आदि-पराशक्ति, भगवान शिव के बायें अर्ध भाग से माता सिद्धिदात्री के रूप में प्रकट हुयीं थीं।

2. देवी कूष्माण्डा - माँ सिद्धिदात्री का रूप धारण करने के पश्चात, देवी पार्वती सूर्य के केन्द्र के भीतर निवास करने लगीं ताकि वह ब्रह्माण्ड को ऊर्जा प्रदान कर सकें। उसी समय से देवी को कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। कूष्माण्डा वह देवी हैं, जिनमें सूर्य के अन्दर निवास करने की शक्ति एवं क्षमता है। देवी कूष्माण्डा की देह की तेज एवं कान्ति सूर्य के समान दैदीप्यमान है।

3. देवी ब्रह्मचारिणी - देवी कूष्माण्डा का स्वरूप धारण करने के उपरान्त देवी पार्वती ने दक्ष प्रजापति की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस रूप में देवी पार्वती एक महान सती थीं तथा उनके अविवाहित ही रूप को देवी ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा जाता है।

4. देवी शैलपुत्री - देवी सती के रूप में आत्मदाह करने के पश्चात, देवी पार्वती ने पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। संस्कृत में शैल का अर्थ पर्वत होता है, इसीलिये देवी को पर्वत की पुत्री शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है।

5. देवी महागौरी - हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी शैलपुत्री सोलह वर्ष की आयु में अत्यन्त रूपवती थीं तथा उन्हें गौर वर्ण का आशीर्वाद प्राप्त था। उनके अत्यधिक गौर वर्ण के कारण उन्हें देवी महागौरी के नाम से जाना जाता था।

6. देवी चन्द्रघण्टा - देवी चन्द्रघण्टा, देवी पार्वती का विवाहित रूप हैं। भगवान शिव से विवाह करने के पश्चात देवी महागौरी ने अपने मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करना आरम्भ कर दिया, जिसके कारण देवी पार्वती को देवी चन्द्रघण्टा के नाम से जाना जाने लगा।

7. देवी स्कन्दमाता - जब देवी पार्वती भगवान स्कन्द (जिन्हें भगवान कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है) की माँ बनीं, तो वह देवी स्कन्दमाता के नाम से लोकप्रिय हो गयीं।

8. देवी कात्यायनी - राक्षस महिषासुर का संहार करने हेतु देवी पार्वती ने देवी कात्यायनी का रूप धारण किया था। यह देवी पार्वती का सबसे उग्र रूप था। देवी पार्वती के कात्यायनी स्वरूप को योद्धा देवी के रूप में भी जाना जाता है।

9. देवी कालरात्रि - जब देवी पार्वती ने शुम्भ एवं निशुम्भ नामक राक्षसों का वध करने हेतु अपनी बाहरी स्वर्णिम त्वचा को हटा दिया, तो उन्हें देवी कालरात्रि के नाम से जाना गया। कालरात्रि देवी पार्वती का सर्वाधिक उग्र एवं वीभत्स रूप है।

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